भारत के इतिहास में कुछ सवाल ऐसे हैं, जो समय के साथ और गहरे होते चले गए। इन्हीं में से एक सवाल यह भी है कि अगर सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री होते, तो देश की दिशा और दशा कैसी होती? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1946 में अंतरिम सरकार के गठन के समय सरदार पटेल कांग्रेस के सबसे मज़बूत दावेदार थे और उन्हें प्रांतीय समितियों का स्पष्ट बहुमत भी प्राप्त था।
लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। इसी वजह से आज भी लोग यह सोचने को मजबूर होते हैं कि अगर पटेल प्रधानमंत्री होते, तो क्या भारत का सफ़र आज से अलग होता।
प्रशासन और शासन व्यवस्था
सरदार पटेल अपने सख़्त प्रशासनिक रवैये और अनुशासन के लिए जाने जाते थे। वे स्पष्ट और तेज़ फैसले लेने में विश्वास रखते थे। अगर पटेल प्रधानमंत्री होते, तो संभवतः शासन व्यवस्था अधिक अनुशासित होती और नौकरशाही पर राजनीतिक दबाव कम रहता। इसके अलावा, सरकारी निर्णयों को लागू करने में देरी नहीं होती और प्रशासन ज़्यादा परिणाम-केंद्रित होता।
वहीं दूसरी ओर, नेहरू विचार-विमर्श और दीर्घकालिक योजनाओं को अधिक महत्व देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि पटेल के नेतृत्व में भारत एक व्यावहारिक और सख़्त प्रशासनिक ढांचे की ओर बढ़ता।
रियासतों के विलय के बाद नीति
सरदार पटेल की सबसे बड़ी उपलब्धि सैकड़ों रियासतों का भारत में विलय था। इसी वजह से उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है। अगर वे प्रधानमंत्री होते, तो केंद्र सरकार और अधिक मज़बूत होती और राज्यों के बीच अधिकारों की सीमाएँ ज़्यादा स्पष्ट रहतीं।
पटेल का मानना था कि देश की एकता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। इस कारण, अलगाववादी प्रवृत्तियों को शुरुआत में ही सख़्ती से रोका जाता और आंतरिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती।
अगर वे प्रधानमंत्री होते, तो:
कश्मीर और विदेश नीति पर दृष्टिकोण
कश्मीर और विदेश नीति को लेकर पटेल और नेहरू के विचार अलग-अलग थे। जहाँ नेहरू अंतरराष्ट्रीय मंचों और संयुक्त राष्ट्र पर भरोसा करते थे, वहीं पटेल का मानना था कि भारत के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
अगर पटेल प्रधानमंत्री होते, तो संभव है कि कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र तक न जाता। परिणामस्वरूप, भारत अपने निर्णय खुद लेने की स्थिति में रहता। इसके अलावा, सीमा विवादों पर अधिक सतर्क और सख़्त नीति अपनाई जाती, जिससे भविष्य की चुनौतियों को पहले ही संभालने की कोशिश की जाती।
आर्थिक नीति और विकास का रास्ता
नेहरू समाजवाद और सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था के समर्थक थे। लेकिन, पटेल निजी क्षेत्र और व्यापार को संदेह की नज़र से नहीं देखते थे। अगर पटेल प्रधानमंत्री होते, तो निजी उद्योगों को पहले ही अधिक अवसर मिलते और व्यापार को बढ़ावा दिया जाता।
इस तरह, लाइसेंस राज जैसी जटिल व्यवस्था शायद उतनी कठोर न होती। परिणामस्वरूप, भारत का आर्थिक विकास अधिक व्यावहारिक और तेज़ हो सकता था।
पटेल बनाम नेहरू: दो अलग सोच
सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू दोनों ही भारत के लिए ईमानदार और समर्पित नेता थे, लेकिन उनकी सोच अलग थी। जहाँ नेहरू आदर्शवाद और अंतरराष्ट्रीय छवि पर ज़ोर देते थे, वहीं पटेल प्रशासनिक अनुशासन और आंतरिक स्थिरता को प्राथमिकता देते थे। इसी वजह से दोनों का नेतृत्व भारत को अलग दिशा में ले जा सकता था। यह कहना सही नहीं होगा कि एक सही था और दूसरा गलत, लेकिन यह स्पष्ट है कि पटेल के नेतृत्व में भारत की प्राथमिकताएँ अलग होतीं।
इस विषय को और गहराई से समझने के लिए आप हमारा यह लेख भी पढ़ सकते हैं, जिसमें बताया गया है कि गांधीजी ने पटेल को प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनने दिया और उस फैसले के पीछे क्या कारण थे।
इतिहास “अगर” से नहीं चलता, लेकिन “अगर” हमें सोचने पर ज़रूर मजबूर करता है। अगर सरदार वल्लभभाई पटेल प्रधानमंत्री होते, तो भारत का रास्ता अलग होता। ज़रूरी नहीं कि वह बेहतर या बदतर होता, लेकिन निश्चित रूप से अलग होता।
सरदार पटेल ने भारत को जोड़ा, जबकि नेहरू ने उसे एक विचार और दिशा दी। शायद यही इतिहास की सबसे बड़ी सच्चाई है।
इतिहासकारों और सरकारी अभिलेखों के अनुसार, उस दौर के कई निर्णय भारत सरकार के राष्ट्रीय अभिलेखागार और ऐतिहासिक शोध पोर्टलों पर दर्ज हैं, जो उस समय की राजनीतिक सोच को समझने में मदद करते हैं।
