पूरी दुनिया को कर्ज देने वाला – जगत सेठ परिवार

राजस्थांन के मारवाड़ का एक व्यापारी परिवार अपने व्यापारिक कौशल और सुजबुझ से इतना शक्तिशाली हो गया की, आगे जाकर वो दुनिया की कई बड़ी रियासतों को कर्ज देने लगा। जिसने कई शाशको को बनाने में तो कुछ को सत्ता से निकालने में भी अहम् भूमिका निभाई। इनका प्रभाव इतना था की कोई भी शाशक या रियासत उनके खिलाफ जाने से पहले कई बार विचार विमर्श किया करते । इनका प्रभाव देखकर मुग़ल शाशक फर्रुखशियर ने उन्हें जगत सेठ की उपाधि दी। तो आइये जानते है एक ऐसे परिवार के बारेमे जो एक समय पर दुनिया का सबसे अमीर परिवार हुआ करता था, इनकी शुरुआत, सफलता ,वैभव और अंत की कहानी।

शुरुआत

जगतसेठ परिवार मूल रूप से राजस्थान के मारवाड़ का रहने वाला था, उस वक्त परिवार के मुखिया मानिकचंद सेठ ने व्यापर के उद्देश्य से 17 वि सदी के अंत में बंगाल जाने का फैसला किया। उस वक्त बंगाल मुग़ल साम्राजय का सबसे विकसित प्रांत था और दूसरे प्रांतो की तुलना में यहाँ व्यापर की संभावनाए भी ज्यादा थी। इस वजह से परिवार राजस्थान से बंगाल आ जाता है और मुर्शिदाबाद को अपना व्यापारिक केंद्र बनाते है।

परिवार ने आरंभ में सोना-चांदी, अनाज और कपडे का व्यापर किया और उसमे बहुत अच्छा मुनाफा किया, इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे साहूकारी बैंकिंग की शरुआत की जिसमे कर्ज देना, हुंडी जारी करना और कर वसूली में मदद करना जैसी सेवाएं प्रदान करने लगा।

विस्तार

जो व्यपार सेठ मानिकचंद ने अनाज और कपड़ो से शुरू किया था उसको उत्तराधिकारीओ ने एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया था। सेठ मानिकचंद के बाद सेठ फतेहचंद ने व्यापर को और बड़ा किया और अपनी सूज-बुज से बहुत संपत्ति अर्जित की। फतेहचंद के बाद सेठ उमेदचंद और उनके बाद सेठ महताबचंद ने अपनी सुजबुझ और व्यापर कौशल से व्यापर को सर्वोच्च स्थान पर पहुंचाया।

महताबचंद के काल जगतसेठ परिवार का सुवर्ण काल माना जाता है, इसी समय मुगल बादशाह फर्रुखशियर ने उन्हें जगतसेठ की उपाधि दी। जिसका मतललब होता है विश्व का सेठ या विश्व का बैंकर। इसी काल में कमजोर हुए मुग़ल शाशन को जगतसेठ परिवार ने युद्ध, प्रशाशन और महलो के लिए धन उपलब्ध कराया और मुगलशाशन के एक स्तम्भ के तौर पर उभरे।

सत्ता में प्रभाव

जगत सेठ परिवार केवल व्यापारी नहीं था, बल्कि बंगाल की वास्तविक आर्थिक सत्ता उनके हाथो में ही थी। नवाब का खजाना, सैनिको का वेतन युद्ध का खर्च जैसी सभी आर्थिक बाबते जगतसेठ परिवार पर ही निर्भर थी। नवाबो की नियुक्ति में भी जगतसेठ परिवार की सहमति जरुरी मानी जाती और जो नवाब उनके विरुद्ध जाता उनका शाशन अस्थिर हो जाता।

जगतसेठ परिवार सीधे मुग़ल बादशाह से जुड़ा हुआ था। टेक्ष, नजराना और कर्ज का प्रबंधन वही करते थे। इसी कारण जगतसेठ परिवार को नवाब से भी ज्याडा प्रभावशाली मन जाता था। एक वक्त ऐसा भी था की इनके बिना बंगाल की अर्थव्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

नवाब सिराजउद्दौला से मतभेद के कारण परिवार ने मीर जफ़र और ईस्ट इण्डिया कम्पनी को समर्थन दिया। जगतसेठ परिवार के आर्थिक सहयोग और रणनीतिक समर्थन से प्लासी की लड़ाई का परिणाम बदला और यही से अंग्रेजो की सत्ता की नीव बंगाल में पड़ी।

जगतसेठ परिवार का पतन

प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजो ने मीरजाफर को कठपुतली नवाब बना दिया और जगत सेठ परिवार को अनावश्यक समझने लगे। अंग्रेजो को उनका धन चाहिए था लेकिन उनका प्रभाव नहीं इसीलिए धीरे धीरे उनके प्रभाव को सिमित किया गया और उनका राजकीय सरक्षण भी ख़तम कर दिया गया।

मीर जफ़र के बाद जब मीर कासिम नवाब बना तो उसने जगतसेठ परिवार और अंग्रेजो दोनों से टकराव किया। 1764 के आसपास जगतसेठ परिवार के प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया और उनपर देशद्रोह और षड़यंत्र का आरोप लगा दिया गया। और उनकी ज्यादातर संपत्ति जब्त कर ली गई और उनके परिवार के सदस्यों को मरवा दिया गया।

मीरकासिम के बाद अंग्रेजो बंगाल की सत्ता अपने हाथो में ले ली और एक अलग केंद्रीकृत बैंकिंग व्यवस्था बनाई जिसमे साहूकारो की कोई दखल नहीं थी। इस तरह जगत सेठ परिवार रुतबा धीरे धीरे ख़तम हो गया, और परिवार एक गुमनामी में चला गया।

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