
राजस्थान केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी चेतना है जो सदियों से स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आत्मसम्मान को अपने जीवन का मूल आधार मानती आई है। भारत के इतिहास में अनेक ऐसे काल आए जब बड़े-बड़े साम्राज्य शक्तिशाली बनकर उभरे, लेकिन राजस्थान की धरती ने कभी भी मन से किसी की गुलामी स्वीकार नहीं की। चाहे मुग़ल काल हो या ब्रिटिश शासन का दौर, इस भूमि की आत्मा हमेशा स्वतंत्र रही।
मुग़ल काल में जब उत्तर भारत का अधिकांश भाग मुग़ल साम्राज्य के अधीन आ चुका था, तब भी राजस्थान के कई राजपूत राज्य पूरी तरह झुके नहीं। मेवाड़ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मेवाड़ के शासकों ने न केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा की, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक स्वतंत्रता को भी बनाए रखा। महाराणा प्रताप ने अकबर जैसे शक्तिशाली सम्राट के सामने झुकने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने वैभव, आराम और राजमहल छोड़ दिए, लेकिन आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया। हल्दीघाटी का युद्ध यह सिद्ध करता है कि राजस्थान के लिए स्वतंत्रता केवल शासन का प्रश्न नहीं, बल्कि आत्मा का विषय था।
यह सच है कि कुछ राजपूत राज्यों ने मुग़लों से संधियाँ कीं, वैवाहिक रिश्ते बनाए और राजनीतिक समझौते किए, लेकिन इसे गुलामी कहना राजस्थान की आत्मा को न समझना होगा। ये समझौते परिस्थितियों के अनुसार किए गए थे, न कि डर या पराधीन मानसिकता के कारण। राजस्थान ने कभी अपनी संस्कृति, परंपराओं और स्वाभिमान को मुग़ल सत्ता के सामने समर्पित नहीं किया। यही कारण है कि यहाँ की पहचान हमेशा अलग बनी रही।
ब्रिटिश काल में भी राजस्थान की कहानी कुछ ऐसी ही रही। जब ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे पूरे भारत पर नियंत्रण स्थापित कर रही थी, तब राजस्थान के कई रियासतों ने अंग्रेज़ों से संधियाँ तो कीं, लेकिन पूर्ण दासता कभी स्वीकार नहीं की। राजपूताना की रियासतें ब्रिटिश शासन में भी अपनी आंतरिक स्वतंत्रता, परंपराओं और सम्मान को बनाए रखने में सफल रहीं। यहाँ अंग्रेज़ों का शासन अधिकतर राजनीतिक दबाव और समझौतों पर आधारित था, न कि पूर्ण अधीनता पर। राजस्थान की जनता और शासक दोनों ही अंग्रेज़ों को कभी अपना स्वामी नहीं मान पाए।
राजस्थान के इतिहास में जौहर और साका जैसी घटनाएँ इस बात का सबसे कठोर लेकिन सच्चा प्रमाण हैं कि यहाँ गुलामी से बेहतर मृत्यु को चुना गया। यह निर्णय भय से नहीं, बल्कि सम्मान से जन्मा था। स्त्रियों और पुरुषों ने यह सिद्ध किया कि पराधीन जीवन से बेहतर बलिदान है। यही मानसिकता मुग़ल काल में भी दिखी और ब्रिटिश काल में भी जीवित रही।
आज जब हम राजस्थान के किलों की प्राचीर पर खड़े होते हैं, तो हमें केवल पत्थर और इमारतें नहीं दिखतीं, बल्कि उन लोगों की सोच महसूस होती है जिन्होंने हर दौर में यह तय किया कि सत्ता बदल सकती है, लेकिन आत्मा नहीं। लोकगीतों, कथाओं और इतिहास के पन्नों में आज भी वह स्वर गूंजता है जो कहता है — “हार स्वीकार की जा सकती है, पर गुलामी नहीं।”
राजस्थान भारत की वह धरती है जिसने मुग़ल काल में भी और ब्रिटिश शासन के दौर में भी कभी दिल से गुलामी स्वीकार नहीं की। यह भूमि हमें सिखाती है कि सच्ची आज़ादी सत्ता से नहीं, सोच से आती है। राजस्थान उसी सोच का जीवंत नाम है।