“तख़्त ऐ ताउस ” मयूर सिंहासन की कहानी

मयूर सिंहासन, जिसे फ़ारसी में तख़्त ऐ ताउस कहा जाता था, मुगल काल की सबसे भव्य और शाही विरासत था। सिंहासन के पीछे मोर की आकृति होने के कारण इसे मयूर सिंहासन कहा गया। यह सिंहासन केवल एक शाही आसन नहीं था, बल्कि 17वीं शताब्दी में भारत की आर्थिक शक्ति, उन्नत शिल्पकला और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक था। इतिहासकार इसे मानव इतिहास की सबसे महंगी शाही वस्तुओं में गिनते हैं।मयूर सिंहासन आज भी पूरी दुनिया के लिए एक कोतुहल का विषय है।

मयूर सिंहासन का निर्माण

मयूर सिंहासन का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहाँ के आदेश पर कराया गया था।शाहजहां के दद्दी पे बैठने के बाद इसके आदेश पर मयूर सिंहासन का निर्माण कार्य 1628 ईस्वी में शुरू हुआ और 1635 ईस्वी में पूरा हुआ, जिसमें लगभग सात वर्ष लगे। इसका निर्माण दिल्ली के लाल किले के दरबार-ए-ख़ास के लिए कराया गया था। शाहजहाँ का उद्देश्य ऐसा सिंहासन बनवाना था जो पूरे विश्व में मुगल साम्राज्य की श्रेष्ठता और वैभव को प्रदर्शित कर सके।

संरचना और डिज़ाइन

मयूर सिंहासन शुद्ध सोने से निर्मित था और इसे बनाने के लिए शाहजहां ने करीब 1 लाख तोला सोना दिया था। सिंहासन के पीछे दो मोरों की आकृति बनाई गई थी, जिनकी फैली हुई पूँछों में बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। मोरों की आँखों में बड़े-बड़े हीरे लगाए गए थे। इसकी ऊँचाई लगभग डेढ़ मीटर मानी जाती है और इसके ऊपर चढ़ने के लिए निचले हिस्से में तीन स्टेप वाली एक चांदी की रत्नजड़ित सीढ़ी बनाई गई थी। इसका डिज़ाइन भारतीय और फ़ारसी शिल्पकला का उत्कृष्ट मिश्रण था।

रत्न और सजावट

मयूर सिंहासन में उस समय के विश्व के सबसे कीमती रत्न जड़े हुए थे। प्रसिद्ध यूरोपीय यात्री जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर के अनुसार, इसमें कोहिनूर हीरा, तैमूर रूबी , पन्ने, नीलम और लगभग एक हज़ार से अधिक मोती शामिल थे।सिंहासन के बाहरी हिस्से में 108 माणिक और 116 पन्ने को जड़ा गया था,हर माणिक का वजन 100 से 200 कैरेट के बिच और हर पन्ना का वजन 30 से 60 कैरेट के बिच में था। इन रत्नों को विशेष स्वर्ण-जड़ाई तकनीक से लगाया गया था, जो उस काल की उन्नत तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।

आर्थिक मूल्य

कई इतिहासकरो के मुताबिक मयूर सिंहासन को बनाने में ताजमहल से दो गुना खर्चा हुआ था। 17वीं शताब्दी में मयूर सिंहासन की अनुमानित लागत लगभग 10 करोड़ रुपये आँकी गई थी। आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार, यह राशि आज के समय में अरबों डॉलर के बराबर हो सकती है। इसी कारण मयूर सिंहासन को इतिहास का सबसे महंगा सिंहासन माना जाता है। यह मुगल साम्राज्य की अपार संपन्नता और आर्थिक शक्ति का प्रतीक था।

राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व

मयूर सिंहासन का निर्माण शाहजहाँ की कला के प्रति रूचि और उसके वैभव को दर्शाता है। मयूर सिंहासन का उपयोग केवल विशेष अवसरों पर किया जाता था। सम्राट इसी सिंहासन पर बैठकर राजदरबार लगाते थे, विदेशी राजदूतों से भेंट करते थे और महत्वपूर्ण शाही घोषणाएँ करते थे। इसका उद्देश्य केवल राजसी सुविधा नहीं, बल्कि विदेशी शक्तियों पर मुगल साम्राज्य की शक्ति और वैभव का गहरा प्रभाव डालना भी था।

नादिर शाह का आक्रमण और लूट

ओरंगजेब के मुग़ल सल्तनत की ताकत और वैभव धीरे-धीरे घटने लगा और इसके बाद आने वाले शाशक अपने साम्राज्य का सही तरीके से नेतृत्व नहीं कर पाए। और आने वाले समय में मुग़ल साम्राज्य को और ज्यादा कमजोर कर दिया। इसी तक का लाभ लेकर 1739 ईस्वी में फ़ारस के शासक नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण कर दिया। करनाल के युद्ध में मुगल सेना की पराजय के बाद नादिर शाह दिल्ली पहुँचा और व्यापक लूटपाट की। वह मयूर सिंहासन और कई अन्य कीमती चीजों को विजय की निशानी के तोर पर अपने साथ फ़ारस ले गया। यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी सांस्कृतिक और आर्थिक क्षतियों में से एक मानी जाती है।

मयूर सिंहासन की वर्तमान स्थिति

आज वर्तमान में मयूर सिंहासन अस्तित्व में नहीं है। फ़ारस पहुँचने के बाद मयूर सिंहासन को उसके मूल रूप में नहीं रखा गया। इसे तोड़ दिया गया, सोना पिघला दिया गया और बहुमूल्य रत्न अलग-अलग कर लिए गए और उसे बाजार में बेच दिए गए। आज मयूर सिंहासन तो नहीं है लेकिन उसमे लगे कीमती हिरे और जेवरात दुनिया के कई देशो में सुरक्षित है किसी न किसी स्वरुप में। मयूर सिंहासन के बहुमूल्य रत्नो में से एक कोहिनूर आज ब्रिटन की महरानी के ताज में लगा हुआ है।


मयूर सिंहासन आज भले ही भौतिक रूप में मौजूद न हो, लेकिन उसकी विरासत अमर है। यह सिंहासन मुगल काल की कलात्मक ऊँचाई, आर्थिक शक्ति और शाही दृष्टिकोण का प्रतीक था।विश्व इतिहास में मयूर सिंहासन को शाही वैभव और ऐतिहासिक क्षति—दोनों के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।मयूर सिंहासन जैसा न कोई सिंहासन पहले था और ना ही ऐसा कोई सिंहासन उसके बाद बना।

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