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दादाभाई नौरोजी – ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं था, बल्कि यह बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक चेतना का भी आंदोलन था। इस चेतना को दिशा देने वाले जिन महान नेताओं ने राष्ट्रवाद की मजबूत नींव रखी, उनमें दादाभाई नौरोजी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें “ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया” कहा जाता है। वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक चरण के प्रमुख उदारवादी (Moderate) नेता थे, जिन्होंने तथ्यों और आर्थिक विश्लेषण के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों को चुनौती दी।

दादाभाई नौरोजी ने यह सिद्ध किया कि भारत की गरीबी किसी प्राकृतिक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि औपनिवेशिक आर्थिक शोषण की देन है। उनके विचारों और सिद्धांतों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक आधार प्रदान किया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) में एक पारसी परिवार में हुआ। उनका परिवार साधारण था, किंतु शिक्षा के प्रति गहरा सम्मान रखता था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बॉम्बे में प्राप्त की और आगे चलकर एल्फिंस्टन कॉलेज से उच्च शिक्षा ग्रहण की।

वे अत्यंत मेधावी छात्र थे और शीघ्र ही उन्होंने शिक्षण कार्य में प्रवेश किया। वे एल्फिंस्टन कॉलेज में गणित और प्राकृतिक दर्शन के प्रोफेसर बने। उस समय किसी भारतीय का इस पद तक पहुँचना अत्यंत दुर्लभ था। इससे स्पष्ट होता है कि वे बौद्धिक रूप से कितने प्रखर थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान भारतीय समाज में आधुनिक सोच को बढ़ावा देने वाला था।

ब्रिटिश संसद के प्रथम भारतीय सदस्य

दादाभाई नौरोजी का राजनीतिक जीवन तब ऐतिहासिक मोड़ पर पहुँचा जब वे वर्ष 1892 में ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के लिए चुने गए। वे इस सदन में पहुँचने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने ब्रिटेन की Liberal Party के उम्मीदवार के रूप में सेंट्रल फिन्सबरी सीट से चुनाव जीता।

यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का विषय थी। संसद में उन्होंने भारतीयों के अधिकारों, प्रशासनिक सुधारों और भारतीय सिविल सेवा में भारतीयों की भागीदारी का प्रश्न उठाया। उन्होंने ब्रिटिश सांसदों के समक्ष यह स्पष्ट किया कि भारत की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है और इसका कारण ब्रिटिश शासन की नीतियाँ हैं।

इंग्लैंड में संगठनों की स्थापना

दादाभाई नौरोजी ने यह समझा कि यदि ब्रिटिश जनता और नीति-निर्माताओं को भारत की वास्तविक स्थिति का ज्ञान होगा, तो सुधारों की संभावना बढ़ेगी। इसी उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1865 में London Indian Society की सह-स्थापना की। इसके बाद 1866 में उन्होंने East India Association की स्थापना की।

इन संगठनों के माध्यम से उन्होंने भारत से संबंधित राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को ब्रिटिश समाज के सामने रखा। यह भारतीय राष्ट्रवाद का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को वैश्विक पहचान दिलाने में सहायता की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भूमिका

दादाभाई नौरोजी Indian National Congress के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। वे तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने—1886 (कलकत्ता), 1893 (लाहौर) और 1906 (कलकत्ता)।

1906 के अधिवेशन में उन्होंने “स्वराज” की मांग को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। यद्यपि वे उदारवादी विचारधारा के नेता थे और संवैधानिक तथा शांतिपूर्ण तरीकों से सुधारों में विश्वास रखते थे, फिर भी उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीयों को स्वशासन का अधिकार मिलना चाहिए।

ड्रेन थ्योरी: आर्थिक शोषण का सिद्धांत

दादाभाई नौरोजी का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक योगदान उनकी “ड्रेन थ्योरी” (1867) है। इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति का निरंतर ‘निकास’ (Drain) कर रहा था। उन्होंने बताया कि भारत से एक बड़ी मात्रा में धन विभिन्न माध्यमों से इंग्लैंड भेजा जाता था—जैसे करों का राजस्व, व्यापारिक लाभ, ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और पेंशन।

उनके अनुसार, यही आर्थिक निकास भारत की गरीबी का मुख्य कारण था। उन्होंने सांख्यिकीय तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर यह सिद्ध किया कि भारत की प्रति व्यक्ति आय अत्यंत कम थी और ब्रिटिश शासन की नीतियाँ इस स्थिति के लिए जिम्मेदार थीं।

साहित्यिक योगदान

वर्ष 1901 में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India प्रकाशित की। इस पुस्तक में उन्होंने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया और यह सिद्ध किया कि भारत की गरीबी औपनिवेशिक शोषण का परिणाम है। यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आर्थिक आधारशिला मानी जाती है।

अन्य राजनीतिक पहल और आयोगों में भूमिका

दादाभाई नौरोजी ने भारतीय विधायी निकायों के विरोध को संबोधित करने के लिए ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स में एक स्थायी समिति के गठन का समर्थन किया। वर्ष 1893 में भारत में सुधारों की पैरवी करने हेतु एक भारतीय संसदीय समिति के गठन में उन्होंने भूमिका निभाई। वर्ष 1895 में उन्हें Royal Commission on Indian Expenditure का सदस्य नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने भारत के वित्तीय मामलों में पारदर्शिता और न्याय की मांग की।

विचारधारा, विरासत और ऐतिहासिक महत्व

दादाभाई नौरोजी उदारवादी विचारधारा के प्रतिनिधि थे। वे मानते थे कि संवैधानिक तरीकों, तर्क और संवाद के माध्यम से भी बड़े परिवर्तन संभव हैं। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को भावनात्मक आवेग से ऊपर उठाकर तार्किक और आर्थिक आधार प्रदान किया।

उनकी सोच ने आगे चलकर गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी जैसे नेताओं को प्रभावित किया। उन्होंने भारतीयों को यह समझाया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक स्वावलंबन और न्याय की स्थापना का भी प्रश्न है।

उनका योगदान इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की समस्याओं को व्यवस्थित रूप से रखा। उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करते हुए भी संवाद और सुधार के मार्ग को नहीं छोड़ा। यही संतुलित दृष्टिकोण उन्हें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक चरण का सबसे विश्वसनीय और सम्मानित नेता बनाता है।


दादाभाई नौरोजी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वैचारिक स्तंभ थे। उन्होंने ब्रिटिश संसद तक भारत की आवाज़ पहुँचाई, आर्थिक शोषण को उजागर किया और स्वराज की मांग को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि तर्क, ज्ञान, संगठन और आर्थिक विश्लेषण के माध्यम से भी किसी राष्ट्र को जागृत किया जा सकता है। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रेरणादायक और स्थायी है।

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