भारत के इतिहास में कुछ फैसले ऐसे हैं, जिनके असर कुछ सालों तक नहीं बल्कि पीढ़ियों तक महसूस किए जाते हैं। कश्मीर विवाद भी ऐसा ही एक मामला है। आज जब कश्मीर भारत की राजनीति, कूटनीति और सुरक्षा का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है, तो यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर यह विवाद शुरू कैसे हुआ। क्या यह स्वाभाविक था या फिर किसी फैसले का परिणाम?
इस सवाल का जवाब हमें आज़ादी के शुरुआती वर्षों में ले जाता है, जब भारत अपने अस्तित्व को संभालने की कोशिश कर रहा था और कई ऐतिहासिक निर्णय लिए जा रहे थे।
कश्मीर का भारत में विलय और शुरुआती हालात
1947 में भारत के विभाजन के समय कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत था, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह थे। वे शुरुआत में भारत या पाकिस्तान, किसी के साथ भी विलय नहीं करना चाहते थे। उनका मानना था कि कश्मीर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रख सकता है। लेकिन यह स्थिति ज़्यादा समय तक नहीं टिक सकी।
अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावर कश्मीर में घुस आए। हालात इतने बिगड़ गए कि महाराजा हरि सिंह को भारत से सैन्य सहायता मांगनी पड़ी। भारत ने साफ़ कहा कि बिना विलय के मदद संभव नहीं है। इसके बाद विलय पत्र पर हस्ताक्षर हुए और कश्मीर कानूनी रूप से भारत का हिस्सा बन गया।
युद्ध की दिशा और बदलता मोड़
विलय के बाद भारतीय सेना ने कश्मीर में प्रवेश किया और धीरे-धीरे हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया। उस समय सैन्य स्थिति भारत के पक्ष में जाती दिख रही थी। कई सैन्य अधिकारियों और इतिहासकारों का मानना है कि अगर अभियान इसी तरह जारी रहता, तो पूरा कश्मीर भारत के नियंत्रण में आ सकता था।
लेकिन यहीं पर एक ऐसा मोड़ आया, जिसने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी।
नेहरू का संयुक्त राष्ट्र जाना
जनवरी 1948 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का फैसला किया। उनका विश्वास था कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाने से भारत को नैतिक बढ़त मिलेगी और पाकिस्तान पर दबाव बनेगा। नेहरू भारत को एक शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाला राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे।
हालाँकि, यह फैसला उस समय आदर्शवादी लग सकता था, लेकिन इसके परिणाम दूरगामी साबित हुए। कश्मीर, जो अब तक भारत का आंतरिक मामला था, अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया।
युद्धविराम और स्थायी बंटवारा
संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद युद्धविराम लागू हुआ। इसके परिणामस्वरूप कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया। एक हिस्सा भारत के पास रहा और दूसरा पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया। यहीं से नियंत्रण रेखा की नींव पड़ी और कश्मीर विवाद एक अस्थायी समस्या की बजाय स्थायी मुद्दा बन गया।
यह वही बिंदु था, जहाँ एक राजनीतिक निर्णय ने आने वाले दशकों की राजनीति तय कर दी।
नेहरू की मंशा और आलोचना
यह समझना ज़रूरी है कि नेहरू का यह फैसला किसी दुर्भावना से प्रेरित नहीं था। वे अंतरराष्ट्रीय कानून, नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि विवादों का समाधान हथियारों से नहीं बल्कि संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहमति से होना चाहिए।
लेकिन राजनीति केवल आदर्शों से नहीं चलती। ज़मीनी सच्चाई और रणनीतिक मजबूरी भी उतनी ही अहम होती है। इसी कारण नेहरू के इस फैसले की आलोचना होती रही है।
पटेल की अलग सोच
वहीं सरदार वल्लभभाई पटेल की सोच इससे अलग थी। उनका मानना था कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और इसमें किसी बाहरी संस्था का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वे व्यावहारिक समाधान और सख़्त प्रशासन के पक्षधर थे। कई इतिहासकार मानते हैं कि अगर पटेल की रणनीति अपनाई जाती, तो कश्मीर का मामला शायद आज इतना जटिल न होता।
यहीं से “पटेल बनाम नेहरू” की सोच का फर्क साफ़ दिखाई देता है।
एक फैसले का लंबा साया
नेहरू का संयुक्त राष्ट्र जाना केवल उस समय का निर्णय नहीं था, बल्कि उसने भारत-पाक संबंधों की दिशा तय कर दी। कश्मीर मुद्दा आज भी दोनों देशों के बीच तनाव का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। यह विवाद केवल ज़मीन का नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति और कूटनीति का प्रतीक बन चुका है।
इतिहास किसी एक व्यक्ति से नहीं बनता, लेकिन कुछ फैसले इतिहास की दिशा ज़रूर बदल देते हैं। कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना भी ऐसा ही एक फैसला था। यह कहना मुश्किल है कि वह फैसला पूरी तरह गलत था, लेकिन यह स्पष्ट है कि उसने कश्मीर को एक आंतरिक समस्या से अंतरराष्ट्रीय विवाद में बदल दिया।
इतिहास हमें यही सिखाता है कि सही नीयत से लिया गया फैसला भी, अगर परिस्थितियों को पूरी तरह न समझे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़ी चुनौतियाँ छोड़ सकता है।
