
सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में अरब सागर के तट पर स्थित है। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और आस्था का जीवंत प्रतीक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे कई बार तोड़ा गया, फिर भी हर युग में इसे दोबारा बनाया गया।
चंद्रदेव और सोमनाथ नाम की उत्पत्ति (पौराणिक तथ्य)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रदेव (सोम) को दक्ष प्रजापति के श्राप से क्षय रोग हो गया था। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें श्राप से मुक्त किया। इसी कारण इस स्थान का नाम सोमनाथ पड़ा — अर्थात सोम के नाथ। यह कथा शिवपुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है।
भगवान कृष्ण द्वारा स्वर्ण मंदिर (परंपरागत मान्यता)
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के काल में सोमनाथ मंदिर का पहला भव्य स्वरूप सोने (स्वर्ण) से बनाया गया था।यह तथ्य शास्त्रीय परंपरा और लोक मान्यता पर आधारित है, न कि आधुनिक ऐतिहासिक प्रमाणों पर। फिर भी यह विश्वास सदियों से जनमानस में प्रचलित है और मंदिर की प्राचीनता को दर्शाता है।
भीमदेव द्वारा पत्थर का मंदिर (ऐतिहासिक तथ्य)
इतिहास के प्रमाणों के अनुसार, गुर्जर-प्रतिहार और सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम (लगभग 11वीं शताब्दी) ने सोमनाथ मंदिर का पत्थर से भव्य पुनर्निर्माण कराया।
यही वह मंदिर था जिसकी समृद्धि, ऊँचाई और वैभव का वर्णन अरब और फारसी यात्रियों ने भी किया है। यह मंदिर उस समय भारत के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिना जाता था।
1025 ई. : महमूद ग़ज़नवी का आक्रमण
1025 ईस्वी में ग़ज़नी के शासक महमूद ग़ज़नवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उसने मंदिर को तोड़ दिया और अपार धन-संपत्ति लूटकर ग़ज़नी ले गया। यह सोमनाथ पर हुआ पहला बड़ा ऐतिहासिक आक्रमण माना जाता है। इस घटना का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है।
लगातार आक्रमण और विध्वंस
महमूद ग़ज़नवी के बाद भी सोमनाथ मंदिर पर हमले जारी रहे।
इतिहासकारों के अनुसार:
- 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापतियों ने
- 14वीं शताब्दी में गुजरात के सुल्तानों ने
- और 1706 ई. में मुगल शासक औरंगज़ेब के आदेश पर
मंदिर को बार-बार ध्वस्त किया गया।
कुल मिलाकर, सोमनाथ मंदिर पर लगभग 16–17 बार आक्रमण हुए और लगभग उतनी ही बार इसका पुनर्निर्माण किया गया।
कितनी बार बनाया गया सोमनाथ मंदिर
ऐतिहासिक और परंपरागत दोनों स्रोतों को मिलाकर माना जाता है कि:
- स्वर्ण मंदिर (कृष्ण काल – परंपरा)
- लकड़ी/चंदन का मंदिर (कुछ ग्रंथों में उल्लेख)
- पत्थर का मंदिर (भीमदेव काल – ऐतिहासिक प्रमाण)
- मध्यकालीन कई पुनर्निर्माण
- 1951 का आधुनिक मंदिर
इस प्रकार सोमनाथ मंदिर को कम से कम 16–17 बार फिर से बनाया गया।
स्वतंत्रता के बाद अंतिम पुनर्निर्माण (1951)
भारत की आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण राष्ट्रीय सम्मान का विषय बना। सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रेरणा से इसका निर्माण शुरू हुआ।1951 में वर्तमान मंदिर बनकर तैयार हुआ और इसका उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया। यह मंदिर चालुक्य शैली में निर्मित है।
सोमनाथ मंदिर केवल एक धार्मिक संरचना नहीं, बल्कि यह हजारों वर्षों की आस्था, संघर्ष और पुनर्जागरण का प्रतीक है। चाहे वह भगवान कृष्ण से जुड़ी परंपराएँ हों या भीमदेव और आधुनिक भारत के ऐतिहासिक तथ्य — सोमनाथ हर युग में भारतीय चेतना का केंद्र रहा है।