
भारतीय कला का एक नायब रत्न
भारतीय कला और शिल्प परंपरा की बात हो और बड़ौदा (वडोदरा) के पर्ल कार्पेट का उल्लेख न आए, ऐसा संभव नहीं। यह कालीन न केवल अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसलिए भी कि यह दुनिया के सबसे अनोखे और महंगे कालीनों में गिना जाता है। यह कालीन भारतीय राजसी वैभव, धार्मिक आस्था और उत्कृष्ट कारीगरी का अद्भुत संगम है।
पर्ल कार्पेट ऑफ बड़ौदा क्या है?
पर्ल कार्पेट ऑफ बड़ौदा एक विशेष प्रकार का कालीन है, जिसे लाखों मोतियों (pearls), हीरे, पन्ने, माणिक और सोने-चाँदी के तारों से सजाया गया है। इसे सामान्य कालीन कहना इसकी भव्यता को कम आँकना होगा, क्योंकि यह वस्त्र से अधिक एक रत्नजड़ित कलाकृति है।
इस कालीन को 19वीं सदी में बड़ौदा रियासत के महाराजा खांडेराव गायकवाड़ ने बनवाया था। कहा जाता है कि यह कालीन मूल रूप से मक्का-मदीना में पैग़म्बर साहब की दरगाह पर चढ़ाने के उद्देश्य से बनवाया गया था, हालाँकि यह योजना पूरी नहीं हो सकी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
19वीं सदी में बड़ौदा रियासत भारत की सबसे समृद्ध और प्रगतिशील रियासतों में से एक थी। गायकवाड़ वंश कला, शिक्षा और संस्कृति का बड़ा संरक्षक माना जाता था।
महाराजा खांडेराव गायकवाड़ ने इस कालीन का निर्माण 1860 के आसपास करवाया। उस समय मोतियों का प्रयोग केवल आभूषणों तक सीमित था, लेकिन कालीन में मोतियों का उपयोग करना एक क्रांतिकारी और अत्यंत साहसिक विचार था।
अद्भुत कारीगरी और डिजाइन
पर्ल कार्पेट की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कारीगरी है।
- इसमें लगभग 15 लाख से अधिक मोती जड़े हुए हैं
- इसके अलावा हीरे, पन्ने और माणिक जैसे कीमती रत्नों का प्रयोग हुआ है
- डिजाइन में इस्लामिक कला से प्रेरित फूलों और ज्यामितीय आकृतियों का प्रयोग दिखाई देता है
- पूरा कालीन हाथ से तैयार किया गया है, जिसमें कई वर्षों का समय लगा
हर मोती इतनी बारीकी से जड़ा गया है कि कालीन देखने में किसी ज्वेलरी पीस जैसा प्रतीत होता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
इस कालीन का उद्देश्य केवल सौंदर्य प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक भावना भी जुड़ी हुई थी। माना जाता है कि महाराजा खांडेराव गायकवाड़ इस कालीन को इस्लामी पवित्र स्थल पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब की मदीना शरीफ में स्थित मजार पर चढ़ाना चाहते थे।यह तथ्य भारतीय इतिहास की उस सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है, जहाँ शासक धर्म से ऊपर उठकर कला और आस्था का सम्मान करते थे।
आज कहाँ है पर्ल कार्पेट?
आज पर्ल कार्पेट ऑफ बड़ौदा भारत में नहीं, बल्कि विदेश में सुरक्षित है। यह कालीन समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय नीलामी घरों और संग्रहालयों में प्रदर्शित होता रहा है।2009 में इसे एक प्रसिद्ध नीलामी में लगभग 5.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 25–30 करोड़ रुपये) में बेचा गया था, जिससे यह दुनिया के सबसे महंगे कालीनों में शामिल हो गया।
पर्ल कार्पेट ऑफ बड़ौदा सिर्फ एक ऐतिहासिक वस्तु नहीं है, बल्कि यह:
- भारतीय शाही वैभव का प्रतीक है
- हस्तशिल्प और जेम-वर्क की उत्कृष्ट मिसाल है
- यह दर्शाता है कि भारत में कला केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि आस्था और सौंदर्य की अभिव्यक्ति रही है
यह कालीन आज भी भारतीय कारीगरों की कल्पनाशीलता और कौशल का विश्वस्तरीय उदाहरण माना जाता है।