पियूष ठक्कर अपहरण और हत्या कांड
14 जुलाई 2006 की रात… राजकोट शहर पर मानसून की हल्की बारिश छाई हुई थी। सड़कें नम थीं और लोग अपने-अपने घरों में आराम कर रहे थे। उसी शहर में रहने वाले प्रसिद्ध इमिटेशन ज्वेलरी व्यापारी जलारामभाई भी अपने परिवार के साथ घर पर थे। समाज में उनकी पहचान एक सफल व्यापारी से ज्यादा एक नेक और मददगार इंसान के रूप में थी। उनके घर से कोई जरूरतमंद कभी खाली हाथ नहीं लौटता था।
उनका इकलौता बेटा पियूष ठक्कर, जिसकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी, उस रात खाना खाने के बाद टीवी देख रहा था। तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।
फोन उठाते ही दूसरी तरफ से एक लड़की की मीठी आवाज सुनाई दी।
“हाय पियूष… कैसे हो? मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ। क्या तुम आ सकते हो?”
पियूष ने पूछा, “आप कौन बोल रही हैं?”
लेकिन लड़की ने अपना नाम नहीं बताया। उसने सिर्फ इतना कहा,
“मैं शास्त्री मैदान के पास लिमडा चौक में तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ।”
17 साल की उम्र में किसी अनजान लड़की का ऐसा फोन आना किसी भी लड़के के लिए उत्सुकता पैदा कर सकता था। पियूष भी उसी उत्साह में आ गया। उसने बिना ज्यादा सोचे मिलने के लिए हाँ कर दी।
घर से निकलते समय जलारामभाई ने पूछा,
“बेटा, इतनी रात को कहाँ जा रहा है?”
पियूष ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“बस पापा, थोड़ी देर में वापस आ जाऊँगा।”
यह कहकर वह अपनी बाइक लेकर घर से निकल गया।
किसी को नहीं पता था कि यह उसके जीवन का आखिरी सफर साबित होगा।
पियूष घर वापस नहीं लोटा
रात गुजरती गई।
घड़ी ने दस बजाए… फिर ग्यारह… और फिर बारह।
लेकिन पियूष घर वापस नहीं लौटा।
चिंतित होकर जलारामभाई ने उसे फोन लगाया, मगर मोबाइल बंद आ रहा था। परिवार के लोग रिश्तेदारों और दोस्तों से संपर्क करने लगे। पूरी रात तलाश जारी रही लेकिन पियूष का कोई सुराग नहीं मिला।
अगली सुबह मामला पुलिस तक पहुँचा।
राजकोट पुलिस ने तुरंत गुमशुदगी का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी। कुछ ही घंटों बाद पुलिस को शास्त्री मैदान के पास पियूष की बाइक मिल गई।
अब साफ था कि मामला सिर्फ गुमशुदगी का नहीं था।
कुछ बहुत गलत हो चुका था।
पियूष के घरवाले पहुंचे पुलिस के पास
16 जुलाई की सुबह जलारामभाई पुलिस स्टेशन जाने के लिए घर से निकले ही थे कि उनके मोबाइल पर एक कॉल आया।
जैसे ही उन्होंने फोन उठाया, दूसरी तरफ से एक भारी आवाज सुनाई दी।
“तुम्हारा बेटा हमारे पास है। अगर उसे जिंदा देखना चाहते हो तो 30 लाख रुपये तैयार रखो।”
इसके बाद कॉल कट गया।
जलारामभाई के हाथ काँपने लगे।
अब यह अपहरण का मामला बन चुका था।
उन्होंने तुरंत पुलिस को पूरी जानकारी दी।
जांच शुरू हुई तो पुलिस ने सबसे पहले उन लोगों की सूची बनाई जिन्हें जलारामभाई और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में अच्छी जानकारी थी।
इसी दौरान एक नाम सामने आया—
आशिष नंदा।
आशिष पहले जलारामभाई की दुकान में काम करता था। कुछ समय पहले उसने नौकरी छोड़कर अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने की बात कही थी।
जलारामभाई ने उसकी आर्थिक मदद भी की थी। उसे उधार माल दिया था ताकि उसका कारोबार शुरू हो सके।
सबसे बड़ी बात यह थी कि आशिष और पियूष अच्छे दोस्त थे।
पुलिस को शक होने लगा कि इस अपहरण के पीछे कोई करीबी व्यक्ति ही हो सकता है।
पुलिस की एक टीम जामनगर पहुँची और आशिष को पूछताछ के लिए राजकोट ले आई।
शुरुआत में आशिष लगातार झूठ बोलता रहा।
कभी कहता कि उसने पियूष को छोड़ दिया था।
कभी कहता कि उसे आगे की कोई जानकारी नहीं है।
लेकिन अनुभवी पुलिस अधिकारियों को उसकी बातों में झूठ साफ दिखाई दे रहा था।
पूछताछ लगातार जारी रही।
दिन बीतते गए।
आखिरकार आशिष टूट गया।
और उसने जो सच बताया, उसने पूरे मामले की तस्वीर बदल दी।
जिसको बेटा माना था उसी ने रची थी साजिस
आशिष ने कबूल किया कि उसने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर पियूष का अपहरण किया था।
उसकी सगाई हो चुकी थी और उसे शादी के लिए पैसों की जरूरत थी।
उसे लगा कि अगर पियूष का अपहरण कर लिया जाए तो जलारामभाई आसानी से फिरौती की रकम दे देंगे।
योजना के तहत उसके साथी नरेश की बहन दीप्ति ने पियूष को फोन किया था।
उसी ने मीठी आवाज में उसे मिलने के लिए बुलाया था।
जैसे ही पियूष निर्धारित जगह पहुँचा, आरोपियों ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी और जबरन कार में बैठाकर जामनगर ले गए।
वहाँ एक किराए के मकान में उसे बंद कर दिया गया।
लेकिन अपराधियों से एक बड़ी गलती हो गई।
कैद के दौरान पियूष ने आशिष की आवाज पहचान ली।
उसने कहा,
“आशिष… तुम? मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो? जितने पैसे चाहिए, मैं पापा से दिलवा दूँगा।”
ये शब्द सुनते ही आशिष के होश उड़ गए।
उसे समझ आ गया कि अब अगर पियूष जिंदा रहा तो पूरी साजिश सामने आ जाएगी।
यहीं से फिरौती की योजना हत्या की साजिश में बदल गई।
हिंगोलगढ़ जंगल में पियूष को उतारा मोत के घाट
अगले दिन आरोपी पियूष को लेकर हिंगोलगढ़ के जंगलों में पहुँचे।
घना जंगल…
चारों तरफ सन्नाटा…
और बीच में अपनी जिंदगी की भीख माँगता एक मासूम लड़का।
लेकिन लालच ने इंसानियत को पूरी तरह मार दिया था।
आशिष और उसके साथियों ने पियूष की हत्या कर दी।
इसके बाद पहचान मिटाने के लिए शव पर पेट्रोल छिड़का गया और उसे आग के हवाले कर दिया गया।
आरोपियों को लगा कि अब कभी कोई सच्चाई तक नहीं पहुँच पाएगा।
लेकिन वे गलत थे।
पुलिस लगातार सबूत जुटा रही थी।
मोबाइल कॉल रिकॉर्ड, गवाहों के बयान, पेट्रोल पंप के कर्मचारियों की पहचान, तकनीकी जांच और अन्य साक्ष्यों ने धीरे-धीरे पूरी साजिश का पर्दाफाश कर दिया।
आखिरकार आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस हिंगोलगढ़ के जंगल पहुँची।
वहाँ से जले हुए मानव अवशेष बरामद किए गए।
डीएनए जांच कराई गई।
रिपोर्ट आने के बाद पुष्टि हो गई कि वे अवशेष पियूष के ही थे।
यह खबर सुनते ही जलारामभाई पूरी तरह टूट गए।
जिस बेटे को वापस पाने की उम्मीद में वे हर दिन जी रहे थे, वह अब इस दुनिया में नहीं था।
बिखर गया एक खुशहाल परिवार
सबसे दर्दनाक बात यह थी कि हत्या किसी दुश्मन ने नहीं की थी।
हत्यारा वही व्यक्ति था जिसे जलारामभाई ने अपने बेटे की तरह प्यार दिया था।
जिसकी आर्थिक मदद की थी।
जिस पर भरोसा किया था।
उसी ने उनके विश्वास की हत्या कर दी।
पुलिस ने इस मामले में सैकड़ों सबूत और दर्जनों गवाह अदालत के सामने पेश किए।
अदालत ने अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने के अपराध में मुख्य आरोपी आशिष नंदा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
बाद में उसने ऊपरी अदालतों में भी अपील की, लेकिन उसकी सजा बरकरार रही।
समय बीत गया।
लेकिन एक पिता का दर्द कभी कम नहीं हुआ।
अपने इकलौते बेटे की मौत के सदमे से उबर नहीं पाने वाले जलारामभाई का भी कुछ वर्षों बाद हृदयाघात से निधन हो गया।
एक खुशहाल परिवार हमेशा के लिए बिखर चुका था।